मेरा गाँव मेरा देश !!! :)
वो दुआर की पुरानी नीम अब बंजर हो गई है ... कुछ अवशेष मात्र बचे हैं ..
वो पुराना घर भी अब पक्का मकान बन गया है .. तब नीम बहार पे रहती थी हमारे पूरे घर को अपनी बाहों में छुपाए हुए ..
हर मौसम के लिए- " पहली छतरी" खुद ही बन जाया करती थी .. हमारे घरौंदे में .. न जाने बुलबुल और गौरैये के कितने घरौन्दे हमारे साथ- साथ पनप रहे थे ..
खैर तब तो हम भी बच्चे हुआ करते थे .. नादान और मासूम !!
अभी तो बात, अब की है, तब की नहीं - तो आगे बढ़ते हैं ...
वो दुआर की पुरानी नीम अब बंजर हो गई है ... कुछ अवशेष मात्र बचे हैं ..
कटहल भी पुराना हो चला है ..
शमी का पेड़ काफी नया है .. अपनी नयी उम्र पे, कुछ इतराया सा लग रहा था ... अच्छा है सब इस उम्र में यही करते हैं ..
जामुन भी काफी फलने लगी है .. और पपीते भी जल्दी पक जाते हैं ..
कोई खाने वाला नहीं है अब ना .. तो सब ही मस्त हैं ..
बाबा ने दुआर पर काफी सब्जियां लगा रखी हैं ..
जितनी की वो दोनों खा भी नहीं सकते .. अकेले ..
आते जाते लोग , बड़े भले हैं .. "सच में" हाल चाल पूछते हैं ..
" बहिनी / बिटिया कैईसन हउ अब "
और शराफत तो देखो जवाब भी सुनते हैं और आशीर्वाद भी देते हुए जाते हैं ..
शहरों की तरह नहीं " हाउ र यु " बोला और जवाब सुने बिना चल दिए जैसे काम पूरा हुआ !!
घर पहुँचते ही सब लोग मिलने चले आए मुझसे .. सवाल पूछे .. हाल चाल पूछे ..
भाई वाह ! लोगों के पास अपने सिवा भी किसी के लिए वक़्त होता है यहाँ .. अब भी ???
हमने सुना था की ज़िन्दगी बहोत " फ़ास्ट " हो गई है .. शायद ये बेचारे पीछे रह गए हैं ..
बाबा क साथ शाम को खाट पे बैठ कर , लैया चना खाना .. मिर्चे लहसुन के चटनी के साथ ... चाय, कम चीनी वाली .. बाबा के लिए .. मज़ा आ गया ...
सब आस पड़ोस के बच्चे इतने बड़े हो गए हैं और इतने सारे भी .. की न वो हमें पहचानते न हम उन्हें ..
यहाँ के आस्मां में तो सच में अनगिनत तारे हैं ..
शहर में तो शहर की रौशनी में छुप जाते हैं बेचारे ..
अपने सभी ख़ास लोगों को उन तारों में पहचान लिया .. पर फिर भी बहुत सारे तारे बचे रह गए थे ...
चाचा चिकेन बना रहे तह और हम घर में से मसाला दे रहे थे ला कर ..
ऐसा लग रहा था फिर से उसी बचपन में पहुँच गए .. जहाँ सब एक था ..
सब अपने थे और कोई मलाल नहीं होता था ..
न रिश्तों से न खुद से .. न खुदा से ..
अरे हाँ ! .. एक बात रह गई बताने को ..
अपने दुआर से , बारिश के मौसम में , शाम के ढल जाने के बाद , बदली से झांकते हुए चाँद की ओर टकटकी लगा के देखना।
सब इतना शांत था और साफ़ .. पाक .. धुला हुआ सा ..
झींगुर ही बोल रहे थे और सुन भी खुद ही रहे थे ..
सब तरफ पसरा हुआ था .. एक हल्का सा " अँधेरा" .
रौशनी के नाम पर था तो बस - वो मलिन सा चन्द्रमा ..
और बाबा के लगे हुए नीम के पेड़ के चारों ओर मंडराते हुए सैकड़ों " जुगनू" ..
ज्यादा कुछ दिख नहीं पा रहा था -- " बाहर का "
इसलिए अन्दर की परतें खुलने लगी थीं अब ..
थोडा प्रकाश डाला अपने अंतर्मन के अँधेरे पर भी ..
इसलिए तो कहती हूँ --
" अँधेरा भी उजाला है "
कभी उसके आगोश में खो कर देखो ..
" सही जगह " पर रौशनी पहुँच जाएगी शायद !!!
फिर खाना खा कर ,
रात को अम्मा बाबा के बीच में सो कर .. फिर से .. वही पुरानी बचपन की कहानियां सुन रही थी .. वही राजा - रानी , सीत - बसंत , नेवला वाली , बन्दर वाली न जाने कितनी सारी सुनी ..
वही कहानियां जो अम्मा जितनी बार सुनाती है , नयी लगती हैं ..
ऐसे जैसे पहली बार सुनी हों ..
वही कहानियां जिनमें जीत हमेशा सच्चाई की ही होती है ..
वही कहानियां जो असलियत में कहानियां थी !!! सिर्फ कहानियाँ !!
पर यही मेरी जन्नत है !