Wednesday, 15 May 2013

बादल पे पाँव है !!!! :)


 आसमां .    जो ज्यादातर नीला ही रहता है ..
दो चार बार आँखों की जहाज से,  वही पुरानी,   उड़ानों   की,
सतरंगी     सपनों    वाली सैर   कर ली  मैने   ..
अब उस  हसरतों  वाले आसमान की   ऒर देखूं ,  तो  धुंए का बस एक गुब्बार  ही नज़र आता है ..
अब    उसे   चाहूँ तो क्यूँ ?






   यूँ तो    ऊँचाइयों से  भी  "मेरा समुन्दर"  खूब भाता है ,
पर एक  फरक हमेशा रहेगा ...
उस  बेचारे की नमकीन पानी के छीटें,   उसकी मदमस्त  अल्लढ़ लेहेरें,
 चाह कर भी  मुझे भिगो नहीं सकती, मुझे छु भी नहीं सकती .. बेचारी वो और मैं भी ...





  वो एक लम्हा कमाल का था ..
नीचे पानी ही पानी था ..,
बीच में बादल .. खूब  सारे
 ..उसपर मैं .. मेरे ऊपर आसमान ...
तू शायद और भी ऊपर था कहीं ..
" दिखाई तो न दिया "






वो दूर कहीं फलक पर ,
बादलों से बना  हुआ ..
सफ़ेद बर्फ से जैसे ढंका  हुआ ..

कुछ कैलाश जैसी कृति दिखी ..
"शिव" मगर कहीं दिख नहीं रहे थे





तू  दो जहान का  मालिक है ना ??  ..
पर तेरे दोनों जहानों   में ..
 मुझे मेरी ज़मीन  ज्यादा प्यारी है,  कहीं ज्यादा ..





खैर आगे बढ़ते हैं ..
समुन्दर पे पड़ती हुई तेज रौशनी ने मानो ..
पानी और बादलों के फरक हो ख़तम ही कर दिया था ..
लगता था ज़मीं ( पानी) से फलक ( आसमान )   तक एक सुनहरे गलिचे पर ,
जीवन के सारे रंग  मिल कर  सुनहरे हो गए हैं ..

पता है .. 
आज पहली बार इतने ऊपर जाकर .. सूर्यास्त को देखा था मैंने  ..
ऊँचाइयों  पर तो और भी  "जल्दी" डूब जाता है ये सूरज ..

 



शाम ढल चुकी थी अब  ... न सूरज ही रहा ,  ना  तारे निकले थे ..
चाँद दिख नहीं रहा था , या शायद .. आज फिर  " अमावस " थी ..
दूर दूर तक पसरा हुआ था .. बस  " अंधेरा ..

शुक्र है .. वो  दोनों जगह एक सा है ..
उतना ही घना  .. उतना ही  काला  !!!

Monday, 6 May 2013

साथ ही मिलते हैं


बेवक़्त आते यादों के काफ़िले ,
गुज़रे वक़्त के कुछ  अधूरे रह गए किस्से ..
और बेबात आंसुओं की ना  थामी जाती  धार  ...

               अक्सर साथ ही मिलते हैं ..
                                            एक दूसरे  के  !!!